मेरी माँ ने कैसे मेरी ऑटिज़्म से लड़ाई में मेरी मदद की: प्यार, थेरेपी और जीत की एक भावनात्मक सच्ची कहानी | सौरभ
मेरा नाम सौरभ है। जब मैं 9 साल का था, दुनिया मुझे अधूरी पहेली जैसी लगती थी। मैं अलग बोलता था, अलग व्यवहार करता था। सहपाठी मुझे “स्पेशल” कहते थे — कुछ दया से, कुछ मज़ाक उड़ाकर। मैं घर आकर माँ को बताता था। उनका जवाब हमेशा एक ही रहता था: “जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा, बेटा।” माँ मेरी थेरेपिस्ट बन गईं। रात-रात भर पढ़ती रहीं, बिना थके सुधारती रहीं। कभी हार नहीं मानीं। धीरे-धीरे धुंध छंटने लगी। और एक दिन समझ आया — उनके प्यार और मेहनत ने ही मेरे दिमाग को दोबारा गढ़ा था। शुक्रिया माँ। आपने मुझे मेरे सबसे अच्छे रूप में ढाला।